गहन शोध का परिणाम: डॉ. गिरीश रंजन तिवारी की पुस्तक का राजभवन (लोकभवन) में विमोचन,ऐसा इतिहास जो पहले कभी नहीं लिखा गया,

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सरोवर नगरी नैनीताल स्थित ऐतिहासिक राजभवन (लोक भवन) के 125 से अधिक वर्षों के गौरवशाली इतिहास और उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने वाली एक अभूतपूर्व क्रांति की शुरुआत हुई है। बुधवार को नैनीताल राजभवन में आयोजित एक बेहद गरिमामयी और भव्य समारोह में उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि) ने वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद् प्रो. डॉ. गिरीश रंजन तिवारी द्वारा लिखित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति "अतीत से वर्तमान तक: नैनीताल का सफर और गॉथिक राजभवन के निर्माण की अद्भुत गाथा" पुस्तक का भव्य विमोचन किया।

इसी ऐतिहासिक मंच से राज्यपाल ने 'AI Theme Room' के मार्गदर्शन में विशेष रूप से विकसित 'AI Heritage & Tourism App' का भी रिमोट का बटन दबाकर लोकार्पण किया। इस दोहरे ऐतिहासिक अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि विरासत और नवाचार का अनूठा समन्वय ही 'विकसित भारत-2047' की सबसे मजबूत आधारशिला है। हमारी ऐतिहासिक धरोहरें हमें अपनी जड़ों से जोड़कर रखती हैं, जबकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी आधुनिक तकनीकें हमें भविष्य की दिशा दिखाती हैं। अपने संबोधन में राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न को याद किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए ‘विकास भी, विरासत भी’ के मूल मंत्र को धरातल पर साकार करने के लिए सांस्कृतिक संरक्षण और तकनीकी नवाचार दोनों को समान रूप से महत्व देना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। लोक भवन केवल पत्थरों और गॉथिक वास्तुकला से बनी एक स्थापत्य संरचना नहीं है, बल्कि यह उत्तराखण्ड की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्मृतियों का एक जीवंत और धड़कता हुआ केंद्र है। आलीशान भवन औपनिवेशिक काल के उतार-चढ़ाव से लेकर स्वतंत्र भारत की सुबह और पृथक उत्तराखण्ड राज्य के गठन तक, अनेक युगांतरकारी घटनाओं और निर्णयों का मूक साक्षी रहा है।

पुस्तक के विमोचन के अवसर पर इसके लेखक प्रो. डॉ. गिरीश रंजन तिवारी ने अपनी भावनाओं को साझा करते हुए कई चौंकाने वाले ऐतिहासिक तथ्यों से पर्दा उठाया। डॉ. तिवारी ने बताया कि राज्यपाल गुरमीत सिंह की व्यक्तिगत प्रेरणा और आग्रह पर ही उन्होंने इस पुस्तक के लेखन और कड़े शोध का जिम्मा उठाया था। उन्होंने बेहद भावुक होते हुए कहा कि उनके स्वयं के परिवार का पुराने राजभवन परिसर से गहरा नाता रहा है और उनका परिवार कभी उस  परिसर में निवास करता था,जिससे यह कार्य उनके लिए एक आत्मिक यात्रा जैसा बन गया। वर्षों तक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अभिलेखों, पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों और विभिन्न प्रामाणिक स्रोतों का अध्ययन करने के बाद जो तथ्य सामने आए, वे बेहद गर्व महसूस कराने वाले हैं।  इस आलीशान राजभवन के निर्माण में पंजाब के सिख समुदाय के कुशल कारीगरों का अतुलनीय योगदान रहा था। वे लोग करीब तीन सालों तक नैनीताल के कठिन मौसम में रहकर इस इमारत को आकार देने में जुटे रहे। भले ही इस गॉथिक भवन का खाका और डिजाइन ब्रिटिश वास्तुकारों ने तैयार किया था, लेकिन सीमित संसाधनों, दुर्गम पहाड़ी मार्गों, अत्यधिक ठंड और कठोर प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच इसे अपनी जान पर खेलकर भारतीय मजदूरों, शिल्पकारों और स्थानीय कारीगरों ने अपने हाथों से तैयार किया था। यही कारण है कि यह भवन आज सवा सौ साल बाद भी उसी मजबूती और भव्यता के साथ अडिग खड़ा है।

आमतौर पर इतिहासकार और आम लोग नैनीताल के इस शानदार राजभवन की तुलना इंग्लैंड के बकिंघम पैलेस से करते आए हैं। लेकिन डॉ. गिरीश रंजन तिवारी ने इस भ्रांति को दूर करते हुए अपने शोध के आधार पर बताया कि वास्तुकला और बनावट के दृष्टिकोण से यह भवन वास्तव में स्कॉटलैंड के सुप्रसिद्ध 'बारमोरेल पैलेस' से सबसे ज्यादा साम्यता (समानता) रखता है। उन्होंने स्वयं स्कॉटलैंड जाकर उन ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण किया और इस समानता को अपनी पुस्तक में सप्रमाण रेखांकित किया है। समारोह का दूसरा सबसे बड़ा आकर्षण 'AI Heritage & Tourism App' रहा। इस तकनीक की सराहना करते हुए राज्यपाल ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के इस आधुनिक युग में तकनीक का उपयोग केवल इंसानी सहूलियत तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे अपनी संस्कृति, इतिहास और समाज के संरक्षण का सबसे सशक्त माध्यम बनाना होगा। यह ऐप नैनीताल और उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और वास्तुकला को डिजिटल माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का एक बेहद अभिनव प्रयास है।

इस अनूठे ऐप में देश-विदेश के पर्यटकों और शोधार्थियों के लिए कई विश्वस्तरीय फीचर्स शामिल किए गए हैं। यह फीचर पर्यटकों को राजभवन और नैनीताल के हर कोने का इतिहास एक गाइड की तरह बोलकर और समझाकर बताएगा। इसकी मदद से सैलानी अपनी रुचि, समय और बजट के अनुसार उत्तराखंड की यात्रा का बेहतरीन शेड्यूल खुद तैयार कर सकेंगे। इसके जरिए लोग नैनीताल के बीते 125 साल के इतिहास को डिजिटल एनिमेशन और तस्वीरों के माध्यम से लाइव देख सकेंगे। राज्यपाल ने इस खास फीचर की तारीफ करते हुए कहा कि इसके माध्यम से उत्तराखंड के स्थानीय नागरिक अपने-अपने क्षेत्रों के उन कम चर्चित लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्थलों की तस्वीरें और जानकारी खुद ऐप पर अपलोड कर सकेंगे जो अब तक दुनिया की नजरों से छिपे हुए हैं। इससे न केवल पर्यटन का विकेंद्रीकरण होगा, बल्कि स्थानीय होमस्टे, गाइडों और छोटे व्यवसायों को सीधे तौर पर आर्थिक लाभ मिलेगा। ऐतिहासिक तथ्यों की प्रामाणिकता को देखते हुए राज्यपाल गुरमीत सिंह ने मंच से एक बड़ी घोषणा की। उन्होंने कहा कि इस मूल्यवान शोध कार्य को केवल अलमारियों तक सीमित नहीं रहने दिया जाएगा। सरकार इस पुस्तक को उत्तराखंड के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के पुस्तकालयों में अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराएगी, ताकि इतिहास और वास्तुकला विषय के विद्यार्थियों और शोधार्थियों को इसका वास्तविक लाभ मिल सके। इसके अलावा राज्य के सभी कैबिनेट मंत्रियों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों (आईएएस/आईपीएस) तक भी इस संदर्भ ग्रंथ को पहुँचाया जाएगा ताकि वे राज्य की ऐतिहासिक धरोहरों की संवेदनशीलता को समझ सकें। समारोह के समापन पर लेखक प्रो. डॉ. गिरीश रंजन तिवारी ने राज्यपाल को पुष्पगुच्छ भेंट कर उनका आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर पुस्तक के मुख्य आवरण पृष्ठ (कवर पेज) पर सुशोभित प्रसिद्ध चित्रकार सुधीर वर्मा द्वारा तैयार की गई राजभवन की एक बेहद खूबसूरत हस्तनिर्मित वॉटरकलर पेंटिंग को स्मृति-चिह्न के रूप में राज्यपाल को भेंट किया गया, जिसकी राज्यपाल ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की। इस ऐतिहासिक और बहुप्रतिष्ठित विमोचन समारोह में राज्य के कई शीर्ष अधिकारी और प्रबुद्धजन गवाह बने। कार्यक्रम में मुख्य रूप से वित्त नियंत्रक डॉ. तृप्ति श्रीवास्तव, संयुक्त निदेशक सूचना डॉ. नितिन उपाध्याय, कलाविद सुधीर वर्मा, डॉ. नीरजा टंडन, सुप्रसिद्ध अधिवक्ता डी.के. शर्मा, विपुल शर्मा, खुशबू शर्मा, कुसुम तिवारी तथा प्रकाशक संतोष सिंह सहित तकनीकी क्षेत्र से जुड़े सिद्धार्थ माधव, कुमाऊं यूनिवर्सिटी के तमाम वरिष्ठ शिक्षक, शोधार्थी और भारी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। यह आयोजन उत्तराखंड के इतिहास में तकनीकी और सांस्कृतिक संरक्षण के एक नए स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है।