आमील प्रोसेसिंग ढांचा बढ़ाने को उत्तराखंड सरकार का रणनीतिक समझौता

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देहरादून। औषधीय गुणों से भरपूर आमील (सीबेकथॉर्न) अब उत्तराखंड की सीमांत हर्षिल घाटी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचेगा। राज्य सरकार ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए तीन फर्मों के साथ लेटर ऑफ इंटेंट (एलओआई) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल से वाइब्रेंट विलेज योजना में शामिल गांवों के लोगों की आर्थिकी को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। शासन स्तर पर हिमशक्ति, ग्रो इंडिया और माई पहाड़ी दुकान के साथ अनुबंध किया गया। ये तीनों फर्म हर्षिल घाटी में आमील के उत्पादन, प्रोसेसिंग, विपणन और ब्रांडिंग में तकनीकी सहयोग प्रदान करेंगी। आमील से तैयार जूस, चटनी, जैम सहित अन्य उत्पादों को ‘हिलांश’ ब्रांड के तहत बाजार में उतारा जाएगा।

उत्तराखंड में आमील का सर्वाधिक उत्पादन हर्षिल घाटी और गंगोत्री नेशनल पार्क क्षेत्र में होता है। स्थानीय लोग पारंपरिक रूप से इसका उपयोग जूस और चटनी बनाने में करते रहे हैं। औषधीय दृष्टि से यह बेहद महत्वपूर्ण फल है, जो ब्लड प्रेशर नियंत्रण, हृदय और त्वचा संबंधी समस्याओं, पाचन तंत्र की बीमारियों में लाभकारी माना जाता है। इसमें ओमेगा 3, 6, 7 और 9 के साथ विटामिन सी, ई और अमीनो एसिड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। वर्ष 2024 में झाला गांव के करीब 50 से अधिक किसानों को आमील उत्पादन से जोड़ा गया था। साथ ही इसे वाइब्रेंट विलेज योजना में शामिल करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया, जिसे अब मंजूरी मिल चुकी है। ग्रामोत्थान परियोजना के तहत यह पहल सीमांत क्षेत्रों में स्वरोजगार और आय वृद्धि का मजबूत माध्यम बनेगी। सरकार को उम्मीद है कि आमील उत्पादों की ब्रांडिंग और अंतरराष्ट्रीय विपणन से स्थानीय किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।