उत्तराखंड में मकर संक्रांति आस्था, भोजन और लोक मान्यताओं का संगम

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आज मकर संक्रांति यानी घुघुतिया त्यार (त्यौहार) है। उत्तराखंड में इस पर्व की विशेष महत्ता है। कुमाऊं में घुघुतिया पर्व के लिए बच्चे बहुत अधिक उत्साहित होते हैं। मकर संक्रांति पर शाम को घुघुत बनाए जाते हैं। अगले दिन बच्चे कौओं को घुघुत खाने के लिए आमंत्रित करते हैं।  उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेश वासियों को मकर संक्रांति, उत्तरायणी और घुघुतिया त्यौहार की बधाई दी है। सीएम के घर भी उत्तरायणी का त्यौहार मनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री की पत्नी गीता धामी ने अपनी सासू मां और बच्चों के साथ घुघुती के साथ तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की है। 

सीएम धामी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा समस्त प्रदेशवासियों को उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं से जुड़े पावन पर्व मकर संक्रांति, उत्तरायणी एवं घुघुती त्यार की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। सूर्यदेव के उत्तरायण होने का यह पावन पर्व हमारी लोक आस्था, प्रकृति से जुड़ाव और जीवन में नवचेतना का प्रतीक है। यह पावन पर्व आप सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, और नई ऊर्जा का संचार करें, यही प्रार्थना है। सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश के समय कुमाऊं में मकर संक्रांति के साथ ही घुघुतिया पर्व बड़े हर्षों उल्लास के साथ मनाया जाता है।  इसे ऋतु परिवर्तन सहित सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है। इस लोकोत्सव को मानने की परंपरा लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।  उत्तराखंड के सीएम आवास में भी मकर संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा है। सीएम की पत्नी गीता धामी ने सोशल मीडिया पर शानदार तस्वीरों के साथ एक पोस्ट लिखी है। 

घुघुतिया पर्व मुख्य रूप से कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत, नैनीताल जिलों के शहरों और ग्रामों क्षेत्रों में पूरी आस्था के साथ हर्षोल्लास से मनाया जाता है।  मकर संक्रांति के दिन प्रातः स्नान ध्यान कर लोग पूजा पाठ करते हैं। वहीं घुघुतिया पर्व मनाने के लिए विशेष तरह के पकवान बनाने की व्यवस्था करते हैं। जिसमें घुघुतिया पर्व पर पारंपरिक मीठा पकवान खजूर जिसे इस अवसर पर "घुघुत" कहा जाता है को कुमाऊं के प्रत्येक घर में लोग बनाते हैं। इस पारंपरिक मीठे पकवान को गेहूं के आटे, गुड़ और घी को मिश्रित कर बनाया जाता है। इस पकवान को विभिन्न आकृतियां प्रदान की जाती हैं। इनमें धनुष, ढोल, मछली, फूल, डमरू, तलवार, ढाल जैसी अनेक पारंपरिक आकृतियां होती हैं।  इन्हें धूप में सुखा कर फिर शाम को घी या तेल में तला जाता है। वहीं घुघुतों को धागे में पिरोकर घर के बच्चों के लिए सुंदर माला बनाई जाती है, जिसमें इन घुघुतों के साथ संतरे भी पिरोए जाते हैं। बच्चे इस माला को लेकर काफी उत्साहित रहते हैं. दूसरे दिन सुबह बच्चे इस माला को गले में पहनकर सूरज की पहली किरण के साथ ही कौओं को बुलाने की परंपरा निभाते हैं। 

मकर संक्रांति के दूसरे दिन सुबह बच्चे स्नान के बाद घुघुतिया माला पहनकर अपनी घर की छतों और आंगन में समूह में एकत्रित होकर कौओं को आवाज लगाकर घुघुति खाने के लिए आमंत्रित करते हैं। इस दौरान बच्चे आवाज लगाते हुए बोलते हैं- काले कौआ काले, घुघुति माला खाले, ले कौआ पूरी मकै दे सूनक छूरी, ले कौवा बड़ा मकै दे सुनक घड़ा, ले कौवा नारंगी मकै दे भल-भल सारंगी, आदि की आवाज लगाकर कौओं को बुलाते हैं। माना जाता है कि बच्चों के बुलाने पर कौए आते हैं और घुघुत को ले जाते हैं जो पूरे परिवार की शुभ और शांति के लिए अच्छा माना जाता है. मान्यता है कि कौआ को भोजन अर्पित करने से घर के पूर्वज और पितृ खुश होते हैं और उनका आशीर्वाद पूरे परिवार को मिलता है। वहीं अगर पितृ दोष है, तो वह भी समाप्त हो जाता है, जिससे घर परिवार में खुशहाली और समृद्धि आती है।